कैसे कहूँ

 कैसे कहूँ 
तेरी सिरत को मै चाँद कैसे कहूँ
तेरी आँचल को सितारे कैसे कहूँ
तुम तो हो मेरी मोहब्बत
तेरे बिना मेरा जीना मुनासिब नही,मेरी जाँ तुझे कैसे कहूँ
जीवन है तुझी से मेरी शुरू मेरी,ये बातें तुझे कैसे कहूँ
पुर्णिमा की चाँद सा खिला है चेहरा तेरा
मै हूँ चकोर तेरे दीदार का तुझे कैसे कहूँ
कभी-कभी मेरी धड़कन भी कुछ कहती है
इस धड़कन मे वसती हो तुम तुझे कैसे कहूँ
मेरे रोम-रोम अब बस चुकी हो,
यहाँ से अब निकल पाना संभव नही
तेरे जाने के बाद ये धड़कन थम न जाए
ये बाते तुझसे कैसे कहूँ !

                                                                                                                        दिवेश कुमार चंद्रा

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