अफ़साना लिखूँ

सुनती हो!मैंने भी सोचा है,
अपनी मोहब्बत का अफ़साना लिखूं,
सुनहरे पल तो हमेशा याद आते है,
सोचता हूँ वहीँ अफ़साना लिखूं,
सुख में ब्यतीत वो पल लिखूं,
या,मौजूदा हाल की दुःख भरी दास्ताँ लिखूं,
जैसे-जैसे वो वक्त विते उनकी यादें,
रूहों की ज़हमत भरी अफ़साना लिखूं,
अब उस गुलशन में फूल नही लगते है,
जहाँ हमदोनों बाहों में बाहें डाल के भ्रमण किये थे,
आज भी  इन बादियो फिजाओं को एहसास है,
सोचता हूँ यही अफ़साना लिखूं,
पहली बार हमने आलिंगन किया जो एहसास,
तुम्हारे उर पर जब चुम्बन किया था वो एहसास,
न भूलने वाली कभी पहली मोहब्बत का वो एहसास,
क्या कहूँ सोचता हूँ, वही मोहब्बत भरी अफ़साना लिखूं  ,

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