प्रेम के एक दिन

प्रेम के एक दिन 
पिछले बरस जब हम मिले थे
18 सितंबर का दिन था जब हम मिले थे
आज भी वो दिन याद आते हैं
एक पल में ही मैंने पा लिया था तुझे
एक ही पल में अपना सबकुछ दे दिया था तुझे
वो काशी का मधुबन था जहाँ हम मिले थे
पल-पल में जब अपना प्रेम प्रवाण चढ़ा
एक अगले पल मे इक दूजे मे हो गए समाहित
भौरा बन रसपान किया
वो सोलहवां साल हमारा जब हम मिले थे
पल-पल से मिनट बन गए,मिनट से घंटे
मिलन के हो गए थे चौबीस घंटे
तरस गए अब उस पल को पाने को
मैं जीवन मे दुबारा भौंरा बन सकु
आज एक बरस हो गए जब हम मिले थे
वो एहसास मेरे ह्रदय में है
वो आलिंगन का एहसास मेरे रोम-रोम मे है
किससे बताऊँ अपनी दिल की बाते
अजीब कसक के साथ याद आती है
वो दिन याद आते है जब हम मिले थे
वो स्पर्श मेरे रोम-रोम मे बसती है
जिसे मै सिर्फ महसूस कर सकता हूँ
हमारे अंग तुम्हारे स्पर्श को तरसते है
एक अनोखी यादों मे अजीब सी खुशी मिलती है
कहीं न कही तुम्हें भी तो वो एहसास होगा
अब बहुत याद आते है जब हम मिले थे।
दिवेश चंद्रा

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