नहीं चाहिए ऐसा प्यार
मैं सोचता हूँ,
प्रेम की कविताएँ लिखूँ,
लेकिन क्यों,
सोच कर रुक जाता हूँ,
तुम्हारे प्रेम पर मुझे घृणा आती है,
तुम्हारा प्रेम अब प्रेम नहीं रह गया,
यह बाज़ारवाद हो गया है,
इस बाज़ारवाद से घिन आती है,
मुझे जिश्म की चाह नहीं है,
लेकिन हमदोनों के बीच तुम ,
जिश्म को समावेश कर देती हो,
मुझे उस जिश्म की गंध से नफरत है,
जो मुझे मदहोश कर देती है,
पागल कर देती है,
नहीं चाहिए होता है मुझे ऐसा प्यार,
जिसके सरोकार में डूब मैं जाऊं,
जिसे हम वासना कहते हैं,
नहीं चाहिए होता है ऐसा प्यार...
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